शनि अमावस्या और सर्वपितृ अमावस्या का महासंयोग आज, मंदिरों में उमड़ेगी श्रद्धालुओं की आस्था..

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शनि अमावस्या और सर्वपितृ अमावस्या का महासंयोग आज, मंदिरों में उमड़ेगी श्रद्धालुओं की आस्था

शनिदेव की आराधना के साथ पितरों का स्मरण, तर्पण और दान-पुण्य का विशेष महत्व; एसपीएम नगर स्थित श्री शिव शनि हनुमान मंदिर में होंगे दर्शन-पूजन

दमोह। शनिवार, 10 अक्टूबर को शनि अमावस्या और सर्वपितृ अमावस्या का विशेष संयोग बन रहा है। पितृ पक्ष की समाप्ति के अवसर पर पड़ रही इस अमावस्या पर शनिदेव की पूजा-अर्चना के साथ पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने, श्राद्ध-तर्पण और दान-पुण्य का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इस अवसर पर दमोह के एसपीएम नगर स्थित श्री शिव शनि हनुमान मंदिर सहित शनि मंदिरों में श्रद्धालुओं के दर्शन-पूजन के लिए पहुंचने की संभावना है।

पंचांग के अनुसार, अमावस्या तिथि 9 अक्टूबर की रात 9 बजकर 35 मिनट से प्रारंभ होकर 10 अक्टूबर की रात 9 बजकर 19 मिनट तक रहेगी।

शनिदेव की आराधना का विशेष महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शनिदेव को न्याय, कर्म और अनुशासन का देवता माना जाता है। शनि अमावस्या पर श्रद्धालु शनिदेव के दर्शन कर परिवार की सुख-शांति, सद्बुद्धि और जीवन में धैर्य बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं। इस दिन दीपदान, मंत्र-जप और जरूरतमंदों को दान देने की परंपरा है।

श्रद्धालु ‘ॐ शं शनैश्चराय नमः’ मंत्र का जाप कर शनिदेव का स्मरण कर सकते हैं। पूजा के दौरान मंदिर की व्यवस्था और पुजारियों के निर्देशों का पालन करने की सलाह दी जाती है।

सरसों के तेल का दीपक और दान-पुण्य

शनि अमावस्या पर सरसों के तेल का दीपक जलाने, पीपल के वृक्ष का पूजन करने तथा काले तिल, अनाज, वस्त्र और भोजन का दान करने की धार्मिक परंपरा है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक पूजा के साथ जरूरतमंदों की सहायता करना भी पुण्यकारी होता है। दान अपनी सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए।

धार्मिक मान्यताओं में अच्छे कर्म, ईमानदारी, बुजुर्गों का सम्मान और जरूरतमंदों की सेवा को भी विशेष महत्व दिया गया है।

सर्वपितृ अमावस्या पर पूर्वजों का स्मरण

एसपीएम नगर स्थित श्री शिव शनि हनुमान मंदिर के पुजारी पं. बालकृष्ण शास्त्री के अनुसार, इस बार शनि अमावस्या के साथ सर्वपितृ अमावस्या का संयोग होने से पितरों के स्मरण, श्राद्ध और तर्पण का भी विशेष महत्व है।

हिंदू परंपरा में सर्वपितृ अमावस्या को उन पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध-तर्पण करने का अवसर माना जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है अथवा जिनका श्राद्ध निर्धारित तिथि पर किसी कारणवश नहीं हो पाया। इस दिन जल और काले तिल अर्पित कर पूर्वजों का स्मरण किया जाता है।

परिवार अपनी परंपराओं के अनुसार श्राद्ध और तर्पण सहित धार्मिक कर्म कर सकते हैं। जरूरतमंदों को भोजन कराना, अन्नदान करना और बुजुर्गों की सेवा करना भी इस अवसर की प्रमुख परंपराओं में शामिल है।

इस प्रकार शनि अमावस्या और सर्वपितृ अमावस्या का यह संयोग श्रद्धालुओं के लिए शनिदेव की आराधना, पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सेवा-दान के संकल्प का अवसर माना जा रहा है।

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