रुक्मिणी जी श्रीलक्ष्मी का स्वरूप, भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने माता गौरी की आराधना की: आचार्य पं. रवि शास्त्री..

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रुक्मिणी जी श्रीलक्ष्मी का स्वरूप, भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने माता गौरी की आराधना की: आचार्य पं. रवि शास्त्री..


जटाशंकर मंदिर में श्रीमद्भागवत कथा का हुआ विश्राम, 3 अक्टूबर से ग्राम मारूताल में होगा दिव्य कथा का शुभारंभ..


दमोह। स्थानीय श्रीदेव जटाशंकर मंदिर परिसर में पितृपक्ष के निमित्त आयोजित श्रीमद्भागवत कथा का शुक्रवार को छठवें दिवस भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी के दिव्य विवाह प्रसंग के साथ विश्राम हुआ। कथा व्यास आचार्य पंडित रवि शास्त्री महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण एवं रुक्मिणी विवाह का शास्त्रीय एवं भावपूर्ण वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को भक्ति, प्रेम, विश्वास और पूर्ण समर्पण का संदेश दिया।


आचार्य पंडित रवि शास्त्री महाराज ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी का विवाह केवल एक लौकिक विवाह का प्रसंग नहीं है, बल्कि जीवात्मा के परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण और अनन्य भक्ति का दिव्य प्रतीक है। पुराणीय एवं वैष्णव परंपरा में माता रुक्मिणी को श्रीमहालक्ष्मी का स्वरूप माना गया है। विदर्भराज भीष्मक के घर उनका प्राकट्य हुआ था। रुक्मिणी जी ने अपने मन, वचन और संकल्प से भगवान श्रीकृष्ण को ही अपना पति स्वीकार कर लिया था।


जन्म से ही दिव्य गुणों से संपन्न थीं रुक्मिणी..


कथा प्रसंग में आचार्य ने बताया कि स्कंद पुराण के अवन्त्यखण्ड में वर्णित रुक्मिणी तीर्थ माहात्म्य के अनुसार विदर्भराज भीष्मक के घर रुक्मिणी जी का जन्म हुआ था। उनके जन्म के समय आकाशवाणी हुई कि इस कन्या को चतुर्भुज भगवान को ही प्रदान करना है। इसके बाद राजा भीष्मक ने विद्वान ब्राह्मणों के साथ स्वस्तिवाचन एवं मंगल कर्म कराया और कन्या का नाम रुक्मिणी रखा।


उन्होंने कहा कि रुक्मिणी जी जन्म से ही असाधारण तेज, सौंदर्य और दिव्य गुणों से संपन्न थीं। वैष्णव परंपरा में उन्हें भगवान श्रीकृष्ण की अर्धांगिनी और श्रीमहालक्ष्मी का स्वरूप माना गया है।


भगवान के गुण सुनकर श्रीकृष्ण को बनाया जीवन का लक्ष्य..


आचार्य पंडित रवि शास्त्री महाराज ने कहा कि रुक्मिणी जी ने संतों, ऋषियों और ब्राह्मणों के मुख से भगवान श्रीकृष्ण के रूप, गुण, पराक्रम, ऐश्वर्य और धर्ममय चरित्र का श्रवण किया। भगवान की महिमा सुनते-सुनते उनका मन पूरी तरह श्रीकृष्ण में अनुरक्त हो गया और उन्होंने निश्चय कर लिया कि भगवान श्रीकृष्ण ही उनके पति होंगे।
उन्होंने बताया कि रुक्मिणी जी ने भगवान श्रीकृष्ण को पति रूप में पाने के लिए माता गौरी की आराधना की। इसी बीच उनके भाई रुक्मी ने उनका विवाह चेदिराज शिशुपाल के साथ करने का निर्णय लिया। परिस्थितियां विपरीत होने के बावजूद रुक्मिणी जी ने भगवान श्रीकृष्ण पर अपना विश्वास नहीं छोड़ा।


ब्राह्मण के माध्यम से श्रीकृष्ण को भेजा संदेश..


कथा में आचार्य ने बताया कि रुक्मिणी जी ने एक विश्वसनीय ब्राह्मण के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण के पास अपना संदेश भेजा। उन्होंने भगवान से निवेदन किया कि वे उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करें। श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में वर्णित यह प्रसंग भक्ति, विश्वास और पूर्ण आत्मसमर्पण का अत्यंत मार्मिक उदाहरण है।
रुक्मिणी जी का संदेश प्राप्त होने पर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें स्वीकार करने का निश्चय किया और बलराम जी के साथ विदर्भ के लिए प्रस्थान किया। विवाह के अवसर पर अनेक राजा और राजकुमार कुंडिनपुर में एकत्रित हुए थे।


देवी मंदिर से निकलते ही श्रीकृष्ण ने किया हरण..


आचार्य ने कथा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि रुक्मिणी जी विवाह से पूर्व देवी के मंदिर में पूजा-अर्चना करने गईं। पूजा के बाद जब वे मंदिर से बाहर निकलीं, उसी समय भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अपने रथ पर आरूढ़ कर लिया। इसके बाद रुक्मी सहित अनेक राजाओं ने भगवान श्रीकृष्ण का पीछा किया, लेकिन भगवान श्रीकृष्ण और बलराम जी ने उनका सामना किया। अंततः भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणी जी को लेकर द्वारका पहुंचे और विधिपूर्वक उनका विवाह संपन्न हुआ।


अनन्य भक्ति और समर्पण का संदेश..


आचार्य पंडित रवि शास्त्री महाराज ने कहा कि रुक्मिणी विवाह का सबसे बड़ा संदेश अनन्य भक्ति, अटूट विश्वास और पूर्ण समर्पण है। रुक्मिणी जी ने सांसारिक वैभव, राजसत्ता और प्रतिष्ठा की अपेक्षा भगवान श्रीकृष्ण के चरणों को अपना सर्वस्व माना। इसी कारण वे सनातन परंपरा में पतिव्रता, भक्ति, प्रेम और समर्पण की आदर्श प्रतिमूर्ति मानी जाती हैं।


उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणी का दिव्य विवाह प्रत्येक भक्त को यह संदेश देता है कि जिस हृदय में भगवान के प्रति निष्काम प्रेम और अटूट श्रद्धा होती है, वहां सांसारिक बाधाएं भक्त के संकल्प को विचलित नहीं कर सकतीं।


जटाशंकर में कथा का हुआ विश्राम, अब मारूताल में होगा शुभारंभ
पितृपक्ष के निमित्त श्रीदेव जटाशंकर मंदिर परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा का शुक्रवार को विश्राम हुआ। कथा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने पहुंचकर भगवान की कथा का श्रवण किया और धार्मिक आयोजन का लाभ लिया।


कथा व्यास आचार्य पंडित रवि शास्त्री जी महाराज ने बताया कि 3 अक्टूबर से ग्राम मारूताल में दिव्य एवं भव्य श्रीमद्भागवत कथा का शुभारंभ होगा। कथा को लेकर श्रद्धालुओं में उत्साह है। आयोजन में भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, भक्ति और सनातन धर्म के विभिन्न आध्यात्मिक प्रसंगों का वर्णन किया जाएगा। आयोजकों ने श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या में पहुंचकर कथा श्रवण करने और पुण्य लाभ अर्जित करने का आग्रह किया है।

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