डिजिटल इंडिया के दौर में ‘टापू’ बना बरखेड़ा: बारिश आते ही दुनिया से कट जाता है गांव, विकास के दावों पर उठे सवाल
गुरैया नदी पर बना नीचा पुल बना ग्रामीणों की सबसे बड़ी परेशानी, बारिश में कई हफ्तों तक नहीं रहता संपर्क
स्कूल नहीं पहुंच पाते बच्चे, मरीजों को नहीं मिलती समय पर चिकित्सा, किसान भी झेलते हैं भारी मुश्किलें
दमोह। एक ओर केंद्र और राज्य सरकारें गांव-गांव तक सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और डिजिटल कनेक्टिविटी पहुंचाने के दावे कर रही हैं, वहीं दमोह जिले की तेंदूखेड़ा जनपद पंचायत अंतर्गत ग्राम पंचायत करौंदी सिंगौरगढ़ का ग्राम बरखेड़ा आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रहा है। हर वर्ष बारिश का मौसम शुरू होते ही यह गांव बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट जाता है और ग्रामीणों का जीवन कई सप्ताह तक गंभीर संकट में गुजरता है।
गुरैया नदी के किनारे बसे बरखेड़ा गांव तक पहुंचने का एकमात्र रास्ता नदी पर बने पुल से होकर गुजरता है। ग्रामीणों का आरोप है कि पुल का निर्माण इतना नीचा किया गया है कि सामान्य बारिश के बाद ही नदी का जलस्तर बढ़ते ही पुल पूरी तरह पानी में डूब जाता है। कई बार स्थिति ऐसी बन जाती है कि पुल लगातार कई-कई हफ्तों तक दिखाई ही नहीं देता। परिणामस्वरूप पूरा गांव एक टापू की तरह चारों ओर से कट जाता है।
स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह ठप
बरसात के दौरान सबसे अधिक परेशानी स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सामने आती है। यदि किसी ग्रामीण की अचानक तबीयत बिगड़ जाए, किसी बुजुर्ग को तत्काल उपचार की आवश्यकता हो या किसी गर्भवती महिला को प्रसव पीड़ा शुरू हो जाए, तो स्थिति बेहद गंभीर हो जाती है। एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती और मरीजों को अस्पताल ले जाना लगभग असंभव हो जाता है। मजबूरी में कई लोग अपनी जान जोखिम में डालकर उफनती नदी पार करने का प्रयास करते हैं।
बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है सीधा असर
बरसात का सबसे बड़ा असर गांव के बच्चों की शिक्षा पर पड़ता है। पुल डूबने के कारण छात्र-छात्राएं कई दिनों नहीं बल्कि कई सप्ताह तक स्कूल नहीं जा पाते। उनकी पढ़ाई बाधित होती है और परीक्षाओं की तैयारी भी प्रभावित होती है। जिस समय देश डिजिटल शिक्षा और आधुनिक तकनीक की बात कर रहा है, उसी समय बरखेड़ा के बच्चे केवल इस इंतजार में रहते हैं कि नदी का पानी कम हो और वे फिर से स्कूल जा सकें।
किसानों की आजीविका पर भी संकट
यह पुल केवल बरखेड़ा गांव का संपर्क मार्ग ही नहीं बल्कि ग्राम पंचायत परासई के किसानों की कृषि भूमि तक पहुंचने का प्रमुख रास्ता भी है। पुल डूबने से किसान अपनी फसलों तक नहीं पहुंच पाते। कृषि कार्य प्रभावित होता है, जिससे आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। इसके अलावा मजदूरी, व्यापार, राशन, दवा और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की आपूर्ति भी प्रभावित होती है।
जनप्रतिनिधियों से नाराज ग्रामीण
ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय नेता गांव में पहुंचकर विकास के बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होने के बाद उनकी समस्याएं भूल जाते हैं। उनका आरोप है कि वर्षों से इस पुल की समस्या बनी हुई है, लेकिन आज तक किसी जनप्रतिनिधि ने इसका स्थायी समाधान कराने की गंभीर पहल नहीं की।
ग्रामीणों का कहना है कि जिले में मंत्री और सांसद होने के बावजूद बरखेड़ा आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। उनका यह भी कहना है कि बरसात के दौरान गांव की वास्तविक स्थिति देखने न तो कोई वरिष्ठ अधिकारी पहुंचता है और न ही कोई जनप्रतिनिधि।
ग्रामीणों ने उठाए कई सवाल
बरखेड़ा के लोगों का कहना है कि वे भी इस देश के नागरिक हैं और उन्हें भी सुरक्षित आवागमन, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सम्मानजनक जीवन का अधिकार है। उनका सवाल है कि यदि हर साल यही स्थिति बनती है तो आखिर स्थायी समाधान क्यों नहीं किया जा रहा।
स्थायी समाधान की मांग
ग्रामीणों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि गुरैया नदी पर ऊंचे स्तर का नया पुल बनाया जाए ताकि बरसात में भी गांव का संपर्क बना रहे। उनका कहना है कि यदि समय रहते इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में किसी बड़ी दुर्घटना से इनकार नहीं किया जा सकता।
बरखेड़ा की यह स्थिति केवल एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में अधूरी आधारभूत संरचनाओं और विकास योजनाओं की जमीनी हकीकत को भी सामने लाती है। अब देखना होगा कि जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि इस समस्या को गंभीरता से लेकर स्थायी समाधान की दिशा में कदम उठाते हैं या फिर इस वर्ष भी ग्रामीणों को बारिश खत्म होने का इंतजार ही करना पड़ेगा।



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