पितरों के निमित्त 20 वर्षों से अखंड भागवत कथा की परंपरा, मारूताल में कृष्ण-रुक्मिणी विवाह का प्रसंग सुन भावविभोर हुए श्रद्धालु..

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पितरों के निमित्त 20 वर्षों से अखंड भागवत कथा की परंपरा, मारूताल में कृष्ण-रुक्मिणी विवाह का प्रसंग सुन भावविभोर हुए श्रद्धालु

पितृपक्ष में आचार्य पं. रवि शास्त्री महाराज करा रहे भागवत कथा का रसपान, इस वर्ष जटाशंकर मंदिर के बाद मारूताल में हो रहा दूसरा आयोजन

दमोह। पितृपक्ष में पितरों के निमित्त श्रीमद्भागवत कथा के आयोजन की आध्यात्मिक परंपरा को पिछले 20 वर्षों से निरंतर आगे बढ़ा रहे कथा व्यास आचार्य पंडित रवि शास्त्री महाराज इस वर्ष भी श्रद्धालुओं को भागवत कथा का अमृतपान करा रहे हैं। दमोह शहर के समीप ग्राम मारूताल में 3 अक्टूबर से प्रारंभ हुई श्रीमद्भागवत कथा के छठवें दिवस भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी के दिव्य विवाह प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया गया। कथा के दौरान श्रद्धालु भक्ति में लीन नजर आए और विवाह प्रसंग पर मंगलगीतों के साथ धार्मिक उत्सव का वातावरण निर्मित हुआ।

इस आयोजन की विशेषता यह है कि पितृपक्ष में पितरों की आत्मिक शांति एवं उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के उद्देश्य से श्रीमद्भागवत कथा आयोजित कराने की यह परंपरा लगातार दो दशकों से चली आ रही है। प्रत्येक वर्ष अलग-अलग स्थानों पर यजमान श्रद्धापूर्वक कथा का आयोजन कराते हैं। इस वर्ष भी धार्मिक अनुष्ठानों की यह श्रृंखला निरंतर जारी है।

पितृपक्ष में इस वर्ष दूसरी भागवत कथा का आयोजन

पितरों के निमित्त श्रीमद्भागवत कथा की इस परंपरा के अंतर्गत 26 सितंबर से दमोह के श्रीदेव जटाशंकर मंदिर परिसर में कथा का आयोजन प्रारंभ हुआ था। यहां 35 यजमानों की सहभागिता रही। जटाशंकर मंदिर में कथा संपन्न होने के बाद इसी पितृपक्ष में ग्राम मारूताल में दूसरी श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें 16 यजमान श्रद्धापूर्वक सहभागी बने हैं।

आचार्य पं. रवि शास्त्री महाराज के माध्यम से संचालित यह धार्मिक यात्रा बीते वर्षों में विभिन्न स्थानों तक पहुंची है। पिछले पांच वर्षों तक लगातार बेलाताल टापू मंदिर में भागवत कथा का आयोजन हुआ, जबकि इसके बाद चार वर्षों तक बूंदाबहू मंदिर में कथा आयोजित की गई। इसके अतिरिक्त अलग-अलग धार्मिक स्थलों और ग्रामों में भी पितृपक्ष के अवसर पर पितरों के निमित्त भागवत कथा का आयोजन होता रहा है।

पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का पर्व है पितृपक्ष

पितृपक्ष में श्रीमद्भागवत कथा के महत्व को रेखांकित करते हुए बताया गया कि सनातन परंपरा में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, तर्पण, श्राद्ध और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष स्थान है। श्रीमद्भागवत महापुराण का श्रवण मनुष्य को भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का मार्ग दिखाने के साथ जीवन में सदाचार, संस्कार और आध्यात्मिक चेतना को मजबूत करता है।

जब भागवत कथा पितरों के निमित्त संकल्प लेकर आयोजित की जाती है, तब इसके माध्यम से परिवार की पूर्ववर्ती पीढ़ियों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव भी व्यक्त होता है। ऐसे आयोजन नई पीढ़ी को अपनी धार्मिक परंपराओं, संस्कारों और आध्यात्मिक विरासत से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

कृष्ण-रुक्मिणी विवाह प्रसंग ने भक्तिमय किया वातावरण

मारूताल में चल रही कथा के छठवें दिवस आचार्य पं. रवि शास्त्री महाराज ने भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी के दिव्य विवाह की कथा सुनाई। प्रसंग में बताया गया कि विदर्भराज भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी भगवान श्रीकृष्ण को अपना आराध्य और पति मान चुकी थीं। हालांकि उनके भाई रुक्मी सहित परिवार के कुछ सदस्य उनका विवाह शिशुपाल से कराना चाहते थे।

ऐसी परिस्थिति में रुक्मिणी जी ने भगवान श्रीकृष्ण को संदेश भेजकर अपनी भावना व्यक्त की और उन्हें विदर्भ आने का आग्रह किया। भक्त की पुकार पर भगवान श्रीकृष्ण विदर्भ पहुंचे और रुक्मिणी जी को अपने साथ ले जाकर विधिपूर्वक विवाह किया।

कथा में इस प्रसंग को जीवात्मा और परमात्मा के दिव्य मिलन का प्रतीक बताया गया। इसके माध्यम से समझाया गया कि जिस प्रकार रुक्मिणी जी का मन पूर्ण रूप से भगवान श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित था, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन में श्रद्धा, विश्वास और समर्पण के भाव को अपनाना चाहिए।

मंगलगीतों के बीच मनाया गया विवाह उत्सव

भगवान श्रीकृष्ण और रुक्मिणी जी के विवाह प्रसंग के दौरान कथा स्थल पर श्रद्धालुओं ने मंगलगीत गाकर और भक्ति भाव के साथ उत्सव मनाया। बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण के लिए उपस्थित रहे। पूरे आयोजन में धार्मिक उल्लास और आध्यात्मिक वातावरण बना रहा।

ग्राम मारूताल में आयोजित यह कथा 20 वर्षों से चली आ रही उस धार्मिक परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसके माध्यम से पितरों के निमित्त भागवत कथा का आयोजन कर समाज में भक्ति, संस्कार और आध्यात्मिक चेतना का संदेश दिया जा रहा है। यह परंपरा पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करने के साथ ही आने वाली पीढ़ियों को सनातन संस्कृति से जोड़ने का माध्यम भी बन रही है।

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