दमोह जिला अस्पताल में स्वास्थ्य व्यवस्था की खुली पोल, कीटनाशक पीने वाली किशोरी को स्ट्रेचर तक नहीं मिला
परिजन खुद स्ट्रेचर पर बच्ची को लिटाकर अस्पताल में भटकते रहे, वार्ड में भर्ती कराने के लिए भी करना पड़ा परेशानियों का सामना
दमोह। जिला अस्पताल दमोह में मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के दावों के बीच एक बार फिर अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कीटनाशक सेवन की स्थिति में अस्पताल पहुंची एक किशोरी के परिजनों को स्ट्रेचर के लिए परेशान होना पड़ा। काफी देर बाद स्ट्रेचर मिलने पर परिजन स्वयं ही बच्ची को उस पर लिटाकर अस्पताल परिसर में भटकते नजर आए। मामला रविवार रात करीब 12 बजे का बताया जा रहा है। इस घटना ने जिला अस्पताल में मरीजों की सहायता और आपातकालीन व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति को उजागर कर दिया है।
कीटनाशक सेवन के बाद हटा से दमोह रेफर हुई किशोरी
प्राप्त जानकारी के अनुसार, दमोह जिले के बटियागढ़ क्षेत्र के बरी मड़ियादो गांव निवासी किशोरी गीता गौंड ने कथित तौर पर घर में रखी कोई दवा भूलवश सेवन कर ली। इसके बाद उसकी तबीयत बिगड़ने पर परिजन उसे उपचार के लिए अस्पताल लेकर पहुंचे। प्राथमिक उपचार के बाद किशोरी को हटा सिविल अस्पताल से दमोह जिला अस्पताल रेफर किया गया।
परिजन उम्मीद लेकर जिला अस्पताल पहुंचे थे कि यहां उन्हें बेहतर उपचार और तत्काल चिकित्सा सहायता मिलेगी, लेकिन अस्पताल पहुंचते ही उन्हें एक नई परेशानी का सामना करना पड़ा। गंभीर स्थिति में अस्पताल लाई गई किशोरी को ले जाने के लिए परिजनों को तत्काल स्ट्रेचर उपलब्ध नहीं हो सका।
स्ट्रेचर के लिए परेशान हुए परिजन, खुद ही बच्ची को लेकर भटकते रहे
परिजनों के मुताबिक, जिला अस्पताल पहुंचने पर काफी देर तक स्ट्रेचर की व्यवस्था नहीं हुई। जब किसी तरह स्ट्रेचर मिला, तो अस्पताल का कोई कर्मचारी किशोरी को संबंधित वार्ड तक पहुंचाने के लिए आगे नहीं आया। ऐसे में परिजन स्वयं ही बच्ची को स्ट्रेचर पर लिटाकर अस्पताल परिसर में इधर-उधर भटकते रहे।
जिला अस्पताल का परिसर काफी बड़ा है। ऐसे में बाहर से आने वाले मरीजों और उनके परिजनों को यह जानकारी नहीं होती कि किस वार्ड में जाना है और भर्ती की प्रक्रिया कहां पूरी करनी है। ऐसी परिस्थितियों में अस्पताल के वार्ड बॉय और संबंधित कर्मचारियों की जिम्मेदारी होती है कि वे मरीज को स्ट्रेचर सहित संबंधित वार्ड तक पहुंचाएं और भर्ती प्रक्रिया में सहयोग करें।
लेकिन इस मामले में परिजनों को स्वयं ही व्यवस्था करनी पड़ी। सवाल यह है कि जब एक किशोरी को तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता थी, तब अस्पताल का जिम्मेदार अमला कहां था?
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले, आखिर कब सुधरेगी व्यवस्था?
दमोह जिला अस्पताल में स्ट्रेचर की अनुपलब्धता और मरीजों को वार्ड तक पहुंचाने में लापरवाही के मामले पहले भी सामने आते रहे हैं। पूर्व में ऑटो रिक्शा से अस्पताल पहुंचे घायल 10 से 12 बच्चों को स्ट्रेचर की सुविधा नहीं मिलने पर परिजन स्वयं ही बच्चों को पीठ पर उठाकर और पैदल अस्पताल के भीतर ले जाते नजर आए थे।
इन घटनाओं के बाद भी यदि व्यवस्था में सुधार नहीं हो रहा है, तो यह अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
मरीजों को स्ट्रेचर उपलब्ध कराना, उन्हें संबंधित वार्ड तक पहुंचाना और भर्ती प्रक्रिया में सहायता करना अस्पताल की मूलभूत जिम्मेदारियों में शामिल है। इसके बावजूद मरीजों के परिजनों को स्वयं ही यह सब करना पड़े, तो फिर अस्पताल में तैनात कर्मचारियों की जिम्मेदारी और जवाबदेही किसके प्रति है?
कलेक्टर के निरीक्षण और निर्देशों के बाद भी नहीं सुधरे हालात?
जिला अस्पताल में व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने के लिए समय-समय पर प्रशासनिक निरीक्षण किए जाते रहे हैं। कलेक्टर द्वारा भी अस्पताल की व्यवस्थाओं को लेकर निर्देश दिए जाने की बात सामने आती रही है। इसके बावजूद मरीजों को स्ट्रेचर जैसी बुनियादी सुविधा के लिए परेशान होना पड़े, तो यह प्रशासनिक निर्देशों के पालन पर भी सवाल खड़े करता है।
अस्पताल प्रबंधन की जिम्मेदारी केवल मरीजों का उपचार कराना ही नहीं, बल्कि उन्हें अस्पताल में प्रवेश से लेकर संबंधित वार्ड में भर्ती होने तक आवश्यक सहायता उपलब्ध कराना भी है। यदि कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन नहीं कर रहे हैं, तो उनके विरुद्ध जवाबदेही तय होना आवश्यक है।
डॉक्टर ने बताया किशोरी की हालत खतरे से बाहर
इस मामले में ड्यूटी डॉक्टर ऐश्वर्या प्रताप ने बताया कि किशोरी की हालत खतरे से बाहर है। प्राथमिक उपचार के बाद उसे अस्पताल में भर्ती कर लिया गया है।
डॉक्टर के इस बयान से किशोरी की स्वास्थ्य स्थिति को लेकर राहत जरूर मिली है, लेकिन अस्पताल में स्ट्रेचर उपलब्ध कराने और मरीज को वार्ड तक पहुंचाने में हुई परेशानी का सवाल अब भी बरकरार है।
अस्पताल प्रबंधन की जवाबदेही तय होना जरूरी
जिला अस्पताल में आने वाले मरीज पहले ही बीमारी, दुर्घटना या अन्य आपातकालीन परिस्थितियों से जूझ रहे होते हैं। ऐसे में उनके परिजनों को स्ट्रेचर, वार्ड और भर्ती प्रक्रिया के लिए भटकना पड़े, तो यह स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
रविवार रात की यह घटना केवल एक किशोरी और उसके परिजनों की परेशानी का मामला नहीं है, बल्कि जिला अस्पताल की व्यवस्थाओं की समीक्षा की आवश्यकता को भी दर्शाती है।
अब देखना होगा कि जिला अस्पताल प्रबंधन इस मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय करता है या फिर यह घटना भी अन्य मामलों की तरह केवल चर्चा तक सीमित रह जाएगी।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब जिला अस्पताल में एक मरीज को स्ट्रेचर और वार्ड तक पहुंचाने की व्यवस्था नहीं मिल पा रही है, तो आखिर अस्पताल प्रबंधन की जवाबदेही कब तय होगी?


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