निनादो का नाद ही डमरू का घोष जिसमें अक्षर विन्यास बने महेश्वर सूत्र : श्री भगवान वेदांताचार्य रसिक..
शिव पुराण की विवेचना में पौराणिक विधाओं का वर्णन करते हुए श्री भगवान वेदांताचार्य जी ने कहा कि पुराणोंमें भगवान् शिवको विद्याका प्रधान देवता कहा गया है। उन्हें ‘विद्यातीर्थ’ नामसे पुकारा गया है और सर्वज्ञ माना गया है। उन्हें ज्ञान, इच्छा एवं क्रिया-इन तीन शक्तियोंका समन्वय एवं समस्त ज्ञानका स्त्रोत माना गया है। ज्ञानपिपासुओंको उन्ही की पूजा एवं आराधना करनेका विशेषरूपसे आदेश किया गया है
यस्य निःश्वसितं वेदा यो वेदेभ्योऽखिलं जगत्। निर्ममे तमहं वन्दे विद्यातीर्थं महेश्वरम् ॥
अर्थात् ‘वेद जिनके निःश्वास हैं, जिन्होंने वेदोंसे सारी सृष्टिकी रचना की और जो विद्याओंके तीर्थ हैं ऐसे शिव भारत के व्याकरण-रचयिताकारों के कुलगुरु महर्षि पाणिनि व्याकरण के सूत्रधार हुए इन्हीं विद्या निधान भगवान् महेश के डमरू का घोष प्रथम शब्द ध्वनि मानी गई,
साधकों के लिए ज्ञान प्राप्त करने का साधन बन गया उस परमात्मज्ञानविषयक बुद्धिको आश्रय रूपमें ग्रहण करने प्रसिद्ध देव परमेश्वर ने यह निनाद उत्पन्न किया जिससे पुनः संगीत का नाद भी जाग्रत हो उदीप्त हुआ ।
वेदोंके छः प्रधान अङ्गोंमें व्याकरण भी एक अङ्ग होने से शब्दों का विवेचन विन्यास की आधार शिला बना , जो अनादि ब्रह्म का स्वरूप है । विनय से सम्पन्न शंकर के मुखारविंद से आविर्भूत यह शास्त्र मयूर के पंखों से लिख जो अनेक सिद्धों के मन को भाया यही
सिद्धों वर्णसमाम्नाय कहा गया यहां से विनिमय और व्यापार के सूक्तों का भी निर्माण हुआ जो अखिल ब्रह्मांड के परिवर्तन में प्रविष्ट हुआ । जिसका घोष दोष की संभावना को सदैव के लिए नष्ट करता है अनुप्राणित रूप से शिव के शरण होने का लाभ दर्शाता है



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