नाग पंचमी पर जटाशंकर धाम में हुआ विराट इनामी दंगल का आयोजन..

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नाग पंचमी पर जटाशंकर धाम में हुआ विराट इनामी दंगल का आयोजन

प्रदेश भर से पहुंचे नामी पहलवान, पारंपरिक अखाड़ा संस्कृति में दिखा दम

दमोह।
जहां एक ओर आधुनिकता की दौड़ में पारंपरिक भारतीय परंपराएं धुंधली पड़ती जा रही हैं, वहीं बुंदेलखंड के हृदयस्थल दमोह में आज भी अखाड़ा संस्कृति जीवंत है। नाग पंचमी के पावन अवसर पर जिले के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल जटाशंकर धाम में प्रतिवर्ष अनुसार इस वर्ष भी विशाल इनामी दंगल प्रतियोगिता का भव्य आयोजन किया गया।

यह दंगल स्वर्गीय श्री चंद्रशेखर पाठक जी की स्मृति में आयोजित किया गया, जिसका संयोजन उनके पुत्र महंत पं. मोनू पाठक एवं मनीष पाठक द्वारा किया गया। कार्यक्रम का संचालन अधिवक्ता श्याम सुंदर विश्वकर्मा ने कुशलता से किया।

प्रदेशभर से पहुंचे पहलवान, दिखाया जोर-शोर से दमखम

इस विशाल दंगल में दमोह जिले के साथ-साथ सागर, कटनी, गढ़ाकोटा, महोबा, शाहगढ, जबलपुर, बीना, सिहोरा, भोपाल जैसे स्थानों से ख्याति प्राप्त पहलवानों ने भाग लेकर अखाड़े में अपने कुश्ती कौशल का प्रदर्शन किया।

कुश्ती मुकाबलों में महेश पहलवान, लक्ष्मण पहलवान और भारत पहलवान जैसे नामचीन खिलाड़ियों ने अपने प्रदर्शन से दर्शकों का दिल जीत लिया। वहीं उभरते युवा पहलवानों ने भी दमदार दांवपेंच दिखाते हुए दर्शकों की जमकर तालियां बटोरीं।

प्रमुख उपस्थितियाँ एवं सामाजिक सहभागिता

दंगल के मंच पर विश्व हिंदू परिषद से अजय खत्री, बजरंग दल से राम मिश्रा, जितेंद्र पहलवान, शत्रु पहलवान, कृष्णा पटेल, तरुण कोरी, अजय भाईसाहब, जटा शंकर ऑटो पार्ट्स के प्रतिनिधि और अनेक सामाजिक हस्तियां उपस्थित रहीं।

प्रतिभागी खिलाड़ियों की सूची में रहे शामिल:

कृष्ण – कटनी

रोहन – शाहगंज

आयुष – जबलपुर

अंकित – हिंडोरिया

ललित – जबलपुर

प्रिंस – हिंडोरिया

नितिन – बीना

राम – गढ़ाकोटा

आदित्य – भोपाल

अखाड़ा परंपरा को जीवित रखने का प्रयास

पं. मोनू पाठक ने आयोजन के माध्यम से युवाओं को अखाड़ा संस्कृति से जोड़ने की प्रेरणा दी। उनका कहना था कि यह सिर्फ खेल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की एक गौरवशाली परंपरा है जिसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना हम सबका दायित्व है।

हजारों की संख्या में उमड़ा जनसैलाब

दंगल देखने के लिए हजारों की संख्या में ग्रामीण एवं शहरी दर्शक जटाशंकर धाम पहुंचे। पूरा वातावरण जयकारों, तालियों और उत्साह से गूंज उठा। आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया कि आज भी बुंदेलखंड की मिट्टी में अखाड़े की गरज और पहलवानों का जोश जिंदा है।

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