चंद्र की कला का मूर्त रूप चंद्रघंटा: श्री भगवान वेदांताचार्य..

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*चंद्र की कला का मूर्त रूप चंद्रघंटा: श्री भगवान वेदांताचार्य*

शक्ति का चिंतन एक गौरवमई गाथा के प्रयोग को जीवन में स्थापित करने का सिद्धांत है ।नवरात्रि के दौरान जब भक्त जप, उपवास और प्रार्थना करते हैं, तो उस ज्ञान को बढ़ता देख पाते है जो अप्राप्त है जैसे चन्द्र की कला अंधकार को मिटाकर शीतल प्रकाश देने में समर्थ है जो क्रमिक विकास जैसा प्रतीत होता है बस वैसा ही है , मां चंद्र घंटा का रूप जो सत्ताईस नक्षत्रों से सजा है । जिस पर अर्ध चंद्र सुशोभित है ।

नवरात्रि केवल एक उत्सव नहीं है, यह अपने भीतर की शक्ति को जगाने का आह्वान है दिव्य स्त्री को अन्य रूप में नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के स्रोत को पहचानने का अवसर है यह कथन श्री भगवान वेदांताचार्य जी के चिन्तन प्रवाह का विवेचन है ।

जो हमें सिखाती है कि पहचान के लिए नाम की आवश्यकता है नाम राशि से बनते है राशि नक्षत्रों के आधीन है नक्षत्र चंद्र की कला है यदि इसके बिना नाम रखना तक संभव नहीं ?

तो पहचान कहा से आयेगी क्योंकि ६४ शाब्दिक वर्णों का यही तो आधार है जिसमें प्रत्येक राशिगत चरण के ४ शब्दों के वर्ण नक्षत्र रूप से नाम का प्रथम अक्षर बनता है यही सृजन है हिंदी जगत की शब्द श्रृंखला का जो चंद्र के घंटे से गुंजाय मान होकर नाद के रूप में प्रगट हो गए और अक्षर बन गए है अर्थात प्रकृति जानती है कि बच्चा मातृ भाषा के बिना कुछ नहीं सीख सकता कुछ भी नहीं जो उसका जीवन आधार है तभी तो शक्ति के तृतीय स्थान पर चंद्र घंटा के रूप में सुशोभित हो मां ने शिशु का प्रथम गुरु बन कर अक्षर विन्यास को आकार दिया।

जिससे विद्या प्राप्त करने में उसकी संतान को आसानी हो साथ ही अब शब्दमई मां के निनाद से गुंजायमान सृष्टि में बौद्धिकता के मापदंड से ऊपर जगत में भारत का नाम (अंकित) उकेर सके जहां शिक्षा, ज्ञान , वाणी का संयम हमे शक्ति का संरक्षण पृथ्वी से चंद्र विज्ञान तक की कला को समाहित किये है ।।

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