शिव सूत्र में समाहित संस्कृति ही प्रकृति की आधारशिला: श्री भगवान् वेदांताचार्य..

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शिव सूत्र में समाहित संस्कृति ही प्रकृति की आधारशिला: श्री भगवान् वेदांताचार्य

दमोह: शिव महापुराण कथा के दौरान श्री भगवान् वेदांताचार्य रसिक जी ने हरिहरात्मक भक्ति के सूत्रधार को स्पष्ट करते हुए कहा कि ‘कृति, विकृति और आकृति’ में ही इस संसार का स्वरूप समाहित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह त्रिगुणात्मक सृष्टि के क्रमिक विकास में जो भी सहायक है, वह शिव का ही अंग है, इसलिए जगत के पंच तत्वों की कार्य योजना बनाने हेतु पंच भूतों का आधार लिया जाता है।

​त्रिगुणात्मक सृष्टि और शिव का योगदान

​श्री भगवान् वेदांताचार्य ने कहा कि संसाधनों के निर्माण में निहित साधन स्वतः स्फूर्त होकर जागृत हो जाते हैं, जब वैदिक वांग्मय के स्त्रोत्र, पाठ, अनुष्ठान, जप और तप से आवृत्त हो जाए।

​पुनः संबोधित करते हुए उन्होंने माहेश्वर सूत्रों में विज्ञान की धारा को मूर्त रूप से विद्यमान बताया। उन्होंने कहा:

​”धर्म एक सजग प्रहरी है जो अन्य चारों पुरुषार्थों की रक्षा करने में सक्षम है। इसलिए सृष्टि की रक्षा करने में भी शिव का योगदान है, जिससे प्रकृति पुष्पित और पल्लवित होती है।”

​संस्कृति और प्रकृति का समन्वय

​वेदांताचार्य जी ने ज़ोर दिया कि संसार का प्रत्येक प्राणी यदि इस व्यवस्था के अनुसार अपने आचार, विचार और संस्कृति को संग्रहित कर निष्पादित करे, तो वह प्रकृति के लिए सहायक सिद्ध होगा, जहाँ दूर-दूर तक कोई विकृति नहीं होगी।

​उन्होंने कहा कि विकृति ही विनाश का कारण है, और सृजन ही सृष्टि है, इसलिए पुराण श्रवण की आवश्यकता है। पुराण ईश्वरीय कृति को मूल रूप में स्थापित करने का प्रयास करते हैं, जिससे मानवीय गुण और धर्म मूल स्वभाव के आदर्श को सिंचित करते हैं।

​सदाशिव का अर्थ और वैश्विक समन्वय

​उन्होंने कहा कि जिसकी सुरक्षा में हम सभी का गौरव विद्यमान है, जो भविष्य की विजय की उद्घोषणा में समाहित है, उन आदर्शों को सिद्ध करने में शिव सदा सहायक हैं, इसीलिए वे सदाशिव कहलाते हैं।

​उन्होंने ‘सदाशिव’ शब्द का अर्थ बताते हुए कहा कि इसका तात्पर्य सदियों से चलते आ रहे मानव को संस्कृति से जोड़कर प्रकृति की उपासना में समाहित करने से है।

​इस धार्मिक आयोजन को सफल बनाने में योगिराज महंत श्री राम करण दास त्यागी, श्री राम दास त्यागी जी महाराज, विनोद कुमार दुबे, पुरषोत्तम जालान, कमलेश केशरी, फलाहारी बाबा संत सेवा ट्रस्ट और महामंगल सेवा समिति का समर्पण भाव से योगदान रहा।

जयतु संस्कृतम्!

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