दमोह में ‘अदृश्य तालाब’ के नाम पर मैदान का सीना चीर रहे माफिया, खनिज विभाग ने कलेक्टर के नाम पर बांटी अवैध उत्खनन की खुली छूट..

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दमोह में ‘अदृश्य तालाब’ के नाम पर मैदान का सीना चीर रहे माफिया, खनिज विभाग ने कलेक्टर के नाम पर बांटी अवैध उत्खनन की खुली छूट

​दमोह। मध्य प्रदेश के दमोह जिले में खनिज संपदा की लूट का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने सरकारी तंत्र और खनन माफियाओं के बीच के गहरे गठजोड़ को बेनकाब कर दिया है। यहाँ खनिज विभाग न केवल नियमों को ताक पर रखकर काम कर रहा है, बल्कि अवैध उत्खनन को ‘वैध’ बताने के लिए जिला प्रशासन के शीर्ष अधिकारियों के नाम का सहारा भी ले रहा है। ताजा मामला ग्राम मैली का है, जहाँ एक खेल मैदान को कागजों पर तालाब बताकर उसे खदान में तब्दील कर दिया गया।

​मैदान बना खदान: ‘अदृश्य तालाब’ की अनोखी कहानी
​पूरा मामला तहसील दमोह के ग्राम मैली के खसरा नंबर 14 (रकवा 0.76 हेक्टेयर) से जुड़ा है। प्रभारी खनिज अधिकारी राजेंद्र कमलेश ने आदेश क्रमांक/खनिज 2025/1396 (दिनांक 03/12/2025) के माध्यम से लखन सिंह निवासी रंजरा को एक माह की ‘अस्थाई परिवहन अनुज्ञा’ जारी की।
​हैरानी की बात यह है कि जिस स्थान पर पूर्व में एक समतल मैदान था, उसे विभाग ने कागजों पर ‘तालाब’ घोषित कर दिया। अनुमति पत्र में दावा किया गया कि पहाड़ी के नीचे स्थित इस ‘अदृश्य तालाब’ की जल क्षमता बढ़ाने के लिए खुदाई की गई है और वहां 2000 घन मीटर मुरम लावारिस हालत में पड़ी है।

विभाग ने बिना मौका मुआयना किए महज 1 लाख रुपये जमा कराकर इस मुरम को ले जाने की अनुमति दे दी। असलियत में, वहां कोई तालाब था ही नहीं; परिवहन अनुज्ञा की आड़ में माफियाओं ने जेसीबी मशीनें उतारकर पूरे मैदान को खोद डाला और अवैध उत्खनन को अंजाम दिया।

​कलेक्टर के नाम की ओट में छिपा भ्रष्टाचार..

​जब इस खुलेआम हो रही लूट की शिकायत प्रभारी खनिज अधिकारी राजेंद्र कमलेश से की गई, तो उनका जवाब बेहद चौंकाने वाला था। अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने के बजाय उन्होंने सारा ठीकरा जिला कलेक्टर पर फोड़ दिया। अधिकारी का तर्क है कि “अनुज्ञा कलेक्टर साहब के हस्ताक्षर से जारी होती है।”

​जानकारों का मानना है कि यह सीधे तौर पर शिकायतकर्ता पर दबाव बनाने और मामले को रफा-दफा करने की कोशिश है। सवाल यह उठता है कि क्या खनिज विभाग ने कलेक्टर को गुमराह कर इन फाइलों पर हस्ताक्षर कराए? क्या विभाग में मौका मुआयना करने और पंचनामा बनाने की परंपरा खत्म हो गई है?

​पूरे जिले में फैला है माफियाओं का जाल..

​दमोह के लगभग हर ब्लॉक में यही स्थिति बनी हुई है। एक तरफ जहाँ शहर में कॉलोनियों की फिलिंग के लिए धड़ल्ले से मुरम की जरूरत है, वहीं माफिया नियमों को ताक पर रखकर सरकारी जमीनों को खोखला कर रहे हैं।

​रेत का अवैध खेल: नदी-नालों से अवैध रूप से रेत निकाली जा रही है।

​मुरम का दोहन: सरकारी प्रोजेक्ट्स की आड़ में निजी फायदे के लिए अवैध उत्खनन किया जा रहा है।

​नियमों की अनदेखी: गौण खनिज नियम 1996 के तहत उत्खनन के लिए पर्यावरण विभाग की NOC और कड़े मानकों की आवश्यकता होती है, लेकिन दमोह में ‘परिवहन अनुज्ञा’ ही अवैध उत्खनन का लाइसेंस बन गई है।

​बर्बादी की कगार पर ग्रामीण संपदा..

​ग्राम मैली का वह मैदान जिसे पंचायत खेल परिसर के रूप में विकसित कर सकती थी, अब गहरी खाइयों में तब्दील हो चुका है। ग्रामीणों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि उनकी सार्वजनिक भूमि को विभाग की मिलीभगत से लूटा गया है। खनिज विभाग की यह कार्यप्रणाली न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रही है, बल्कि शासन को करोड़ों रुपये के राजस्व का चूना भी लगा रही है।
​अब देखना यह होगा कि क्या जिला प्रशासन इस गंभीर भ्रष्टाचार पर संज्ञान लेकर प्रभारी खनिज अधिकारी पर कार्रवाई करता है, या फिर ‘साहब के हस्ताक्षर’ की दुहाई देकर माफियाओं का यह खेल यूँ ही चलता रहेगा।

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