वन क्षेत्र में आग लगने से मांसाहारी प्राणियों पर पड़ने वाले असर को जानते हैं।
जब ग्रीष्मकालीन रितु आतीं हैं तो कुछ प्राकृतिक पौधे, वृक्ष , घांस हरियाली का रुप धारण कर लेते और जो कि शाकाहारी वन्य प्राणियों का भोजन बनतें है तब मांसाहारी प्राणियों का भोजन तय होता है। परन्तु आग लगने से हरी घास,आग की लपट से पेड़ पौधों की पत्तियों सूक जाती है । यहां तक कि छोटे छोटे पौधे नष्ट हो जाते हैं। यही शाकाहारी प्राणियों का भोजन होता है तब मांसाहारी प्राणियों के जीवन में संकट आने लगता और धीरे धीरे दोनों प्राणियों का लुप्त होना तय है। जब हम पर्यावरण चक्र की बात करते हैं तब जैसे टाईगर को आग से जलें हुए क्षेत्र से गुजरने एवं शिकार करने में कठिनाइयां उत्पन्न होती है । क्योंकि टाईगर के पंजे गद्देदार होते हैं और चौड़ाई में अधिक तब उनके पंजे के बीचोंबीच अंतराल में आग से जलें अवशेष नुकीली स्थिति में तब्दील होने पर शिकार करने की संभावना कम हो जाती है । इसलिए शाकाहारी भोजन से मांसाहारी जीवन में भोजन की कमी पर असर पड़ता है।
तब टाईगर अपने भोजन की तलाश में निकलता है। और आग वाले क्षेत्र ही उनकी असफलता होती है।और भूख जैसी स्थिति में गर्मी जैसे मौसम में पहले किये हुए शिकार का सेवन करने पर नुकसानदेह होता है । इसलिए दोनों प्राणियों में लुप्त जैसी स्थिति पैदा होती है। जिसका कारण मानव है।
आग न लगें तभी शाकाहारी, मांसाहारी जीवन जिससे मानवीय जीवन संभव है।
विश्व पृथ्वी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं


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