जबलपुर में भक्ति की बयार: श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन प्रहलाद चरित्र और समुद्र मंथन का अद्भुत वर्णन..

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​🕉️ जबलपुर में भक्ति की बयार: श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन प्रहलाद चरित्र और समुद्र मंथन का अद्भुत वर्णन

जबलपुर। श्री शक्ति महिला मंडल के तत्वावधान में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन भक्तों ने श्रद्धापूर्वक कथा श्रवण किया। कथा प्रवक्ता श्री घनश्याम मिश्रा जी के मुखारविंद से चतुर्थ दिवस की कथा में प्रहलाद चरित्र और समुद्र मंथन की शिक्षाप्रद कथाओं का सुंदर वर्णन किया गया।

​🙏 हर जगह हैं भगवान, बस प्रेम और विश्वास हो

​महाराज श्री घनश्याम मिश्रा जी ने प्रहलाद चरित्र का वर्णन करते हुए बताया कि प्रहलाद जी के जीवन से हमें यह सीखना चाहिए कि भगवान हर जगह हैं, बस विश्वास होना चाहिए। उन्होंने कहा, “प्रेम ते प्रकट होहि मैं जाना” अर्थात् जहाँ सच्चा प्रेम होता है, वहाँ भगवान स्वयं प्रकट होते हैं, क्योंकि “रामहि केवल प्रेम पियारा” है।

​🐍 विष पीने वाला ही महान होता है

​महाराज जी ने आगे समुद्र मंथन की कथा का मार्मिक वर्णन किया। उन्होंने बताया कि मंथन में सबसे पहले विष (हलाहल) निकला, जिसे भोलेनाथ ने पीकर संसार को यह संदेश दिया कि संसार रूपी बुराई या विष को जो पीता है, वही महान होता है। इसी त्याग के कारण भगवान शिव महादेव कहलाते हैं।

​जब अमृत निकला और असुर उसे ले गए, तो देवताओं की चिंता पर भगवान ने कहा:

“जो मेरे भरोसे रहता है, मैं उसकी इस प्रकार रक्षा करता हूँ, जैसे एक माँ अपने पुत्र की रक्षा करती है।”

​— जिमि बालक राखे महतारी। सदा करहूँ तिनकि रखवाली ॥

​इसके बाद भगवान ने मोहिनी रूप धारण करके असुरों को भ्रमित किया और देवताओं को अमृतपान करवाया। महाराज जी ने इससे यह सीख दी कि हमें हमेशा भगवान पर भरोसा रखना चाहिए।

​🏹 श्रीराम के आदर्श और श्रीकृष्ण का अवतार

​कथा के अगले भाग में श्री मिश्रा जी ने भगवान श्रीराम के परम पवित्र चरित्र और उनके आदर्शों पर चलने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि राम के आदर्शों पर चलने वाला कभी अपने मार्ग से विचलित नहीं होता।

​अंत में, उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की विचित्र कथा का वर्णन करते हुए बताया कि जब संसार में अत्याचार और अधर्म बढ़ता है, तभी भगवान दुष्टों का संहार करने और संसार की रक्षा के लिए अवतार लेते हैं। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ और जन्म लेते ही वे गोकुल चले गए, जहाँ उनका सुंदर जन्मोत्सव मनाया गया। महाराज जी ने श्रोताओं से भगवान की कथा सुनने और आनंद लेने के साथ-साथ उनके कहे गए उपदेशों का पालन करने का आह्वान किया।

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