दमोह जिला अस्पताल फिर सवालों के घेरे में..सुरक्षा, स्वच्छता और पारदर्शिता पर उठे गंभीर प्रश्न..

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दमोह जिला अस्पताल फिर सवालों के घेरे में..
सुरक्षा, स्वच्छता और पारदर्शिता पर उठे गंभीर प्रश्न..


दमोह। दमोह जिला अस्पताल एक बार फिर विवादों और अव्यवस्थाओं को लेकर सुर्खियों में है। कभी नर्सिंग स्टाफ और कर्मचारियों पर पैसों की लेन-देन के आरोप, तो कभी रात्रिकालीन सुरक्षा व्यवस्था में लापरवाही—अस्पताल की कार्यप्रणाली लगातार सवालों के घेरे में बनी हुई है।
रात्रिकालीन सुरक्षा व्यवस्था पर लापरवाही..
अस्पताल परिसर में रात्रि ड्यूटी पर तैनात सुरक्षा गार्डों की भूमिका भी संदेह के दायरे में है। जिन स्थानों को सुरक्षा के उद्देश्य से निर्धारित किया गया है, वहां कई गार्ड ड्यूटी के दौरान सोते पाए गए। यह स्थिति मरीजों और उनके परिजनों की सुरक्षा के लिहाज से बेहद गंभीर मानी जा रही है।
इस संबंध में जब अस्पताल के सिविल सर्जन पहलाद पटेल से बात की गई, तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि “यदि कोई भी सुरक्षा गार्ड ड्यूटी के दौरान सोता हुआ पाया जाता है, तो उसके खिलाफ तत्काल निलंबन की कार्रवाई की जाएगी।”


एजेंसियों की जानकारी देने में क्यों हिचक ?
दमोह जिला अस्पताल में कार्यरत विभिन्न एजेंसियों को लेकर भी पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं। जब प्रबंधक विक्रम सुरेंद्र से पूछा गया कि अस्पताल में कौन-कौन सी एजेंसियां कार्यरत हैं, तो उन्होंने जानकारी देने के बजाय सूचना के अधिकार (RTI) के तहत आवेदन करने की बात कही।
यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि सभी एजेंसियां नियमों के तहत और पारदर्शिता से काम कर रही हैं, तो सामान्य जानकारी देने में आपत्ति क्यों?
स्वच्छता और मूलभूत सुविधाओं की बदहाल स्थिति..
एमपी 34 न्यूज़ द्वारा किए गए निरीक्षण में अस्पताल परिसर की कई गंभीर खामियां सामने आईं।
अस्पताल के बाहर स्थित चौकी परिसर के बाथरूम में इतनी गंदगी है कि वहां जाना दूभर हो चुका है।
गेट परिसर में पानी की व्यवस्था बंद पाई गई, जिससे दूर-दराज से आने वाले मरीजों और उनके परिजनों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।


निरीक्षण के बाद ही क्यों सुधरती हैं व्यवस्थाएं?
यह भी देखा गया है कि जब-जब कलेक्टर सुधीर कुमार कोचर अस्पताल का निरीक्षण करते हैं, तब तक व्यवस्थाएं कुछ समय के लिए दुरुस्त नजर आती हैं। लेकिन उनके जाने के बाद हालात फिर पहले जैसे हो जाते हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या व्यवस्थाएं केवल निरीक्षण तक ही सीमित रह गई हैं?
रैन बसेरा का मामला फिर चर्चा में..
कुछ समय पहले अस्पताल से जुड़े रैन बसेरा में लापरवाही के चलते तत्कालीन कलेक्टर सुधीर कुमार कोचर द्वारा दो से तीन कर्मचारियों को निलंबित किया गया था।
अब फिर से जानकारी सामने आ रही है कि रैन बसेरा में कुछ कर्मचारियों द्वारा मरीजों के परिजनों से पैसे वसूले जा रहे हैं। हालांकि मामला तूल पकड़ने से पहले आपसी समझौते में दबा दिया गया, लेकिन यह घटना भी अस्पताल प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है।
कब खत्म होगा अवैध वसूली का यह सिलसिला?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कब तक मरीजों और उनके परिजनों के साथ इस तरह का अमानवीय व्यवहार और अवैध वसूली होती रहेगी? क्या प्रशासन केवल शिकायत सामने आने पर ही कार्रवाई करेगा, या फिर स्थायी और सख्त निगरानी व्यवस्था बनाई जाएगी?


दमोह जिला अस्पताल से जुड़े ये तमाम मामले यह संकेत देते हैं कि केवल निरीक्षण और अस्थायी कार्रवाई से नहीं, बल्कि निरंतर निगरानी, पारदर्शिता और जवाबदेही से ही हालात सुधर सकते हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन इन सवालों पर कब और कैसे ठोस कदम उठाता है।

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