दमोह जिला अस्पताल में गर्भवती को नहीं मिली एम्बुलेंस, निजी वाहन से जबलपुर रेफर; स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल
दमोह। जिला अस्पताल दमोह में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। गंभीर हालत में जबलपुर रेफर की गई एक गर्भवती महिला को घंटों तक सरकारी एम्बुलेंस नहीं मिल सकी, जिसके बाद परिजनों को मजबूरन निजी एम्बुलेंस कराकर उसे उपचार के लिए जबलपुर ले जाना पड़ा। घटना ने अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली और आपातकालीन सेवाओं की उपलब्धता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
जानकारी के अनुसार पथरिया क्षेत्र के नंदरई गांव निवासी गर्भवती महिला शालिनी को प्रसव पीड़ा होने पर परिजन जिला अस्पताल लेकर पहुंचे थे। जांच के दौरान चिकित्सकों ने पाया कि गर्भ में पल रहे शिशु द्वारा गर्भाशय में मल त्याग किए जाने सहित अन्य जटिलताएं हैं, जिसके चलते महिला को तत्काल उच्च स्तरीय उपचार के लिए जबलपुर रेफर कर दिया गया।
दो से तीन घंटे तक एम्बुलेंस का इंतजार..
परिजनों का आरोप है कि रेफर होने के बाद उन्होंने अस्पताल परिसर में करीब दो से तीन घंटे तक एम्बुलेंस के लिए भटकते रहे, लेकिन उन्हें कोई वाहन उपलब्ध नहीं कराया गया। उनका कहना है कि पहले अस्पताल स्टाफ द्वारा यहीं प्रसव कराने का भरोसा दिया गया, लेकिन देर रात अचानक रेफर कर दिया गया। ऐसे में प्रसव पीड़ा से कराह रही महिला को लेकर परिवार बेहद परेशान रहा।
आखिरकार सरकारी व्यवस्था से निराश होकर परिजनों ने निजी एम्बुलेंस बुलाई और अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाते हुए महिला को जबलपुर रवाना किया।
चार एम्बुलेंस और आठ जननी वाहन उपलब्ध, फिर भी संकट..
सूत्रों के अनुसार जिला अस्पताल में एएलएस, बीएलएस और रेडक्रॉस सहित चार एम्बुलेंस उपलब्ध हैं। इसके अलावा जिले में आठ जननी वाहन संचालित हैं तथा एक आरकेएस (रोगी कल्याण समिति) की इमरजेंसी गाड़ी भी उपलब्ध है। इसके बावजूद गंभीर मरीजों को समय पर वाहन न मिलना व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर करता है।
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले..
यह पहला अवसर नहीं है जब जिला अस्पताल की एम्बुलेंस व्यवस्था पर सवाल उठे हों। इससे पहले भी कई मामलों में मरीजों और उनके परिजनों को घंटों इंतजार करना पड़ा है। पूर्व कलेक्टर सुधीर कुमार कोचर के कार्यकाल में भी ऐसे मामलों के संज्ञान में आने पर तत्काल हस्तक्षेप कर एम्बुलेंस उपलब्ध कराई गई थी।
रात के समय अस्पताल में न तो प्रबंधक उपलब्ध रहते हैं और न ही वरिष्ठ स्वास्थ्य अधिकारी। वहीं 108 सेवा संचालक और संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा फोन कॉल रिसीव न किए जाने की शिकायतें भी लगातार सामने आती रही हैं।
ड्यूटी डॉक्टर ने कहा- हमारा काम रेफर करना..
मामले को लेकर रात्रिकालीन ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर प्रीति पटेल से चर्चा की गई तो उन्होंने कहा कि मरीज को रेफर करना चिकित्सक का कार्य है। कौन सी एम्बुलेंस उपलब्ध है और किसे भेजा जाएगा, यह अस्पताल प्रबंधन और मैनेजर का विषय है।
प्रबंधक बोले- जननी वाहन भी भेजे जा सकते हैं..
जिला अस्पताल प्रबंधक सुरेंद्र विक्रम ने बताया कि यदि रात में एएलएस, बीएलएस या 108 एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं हैं तो गंभीर मरीजों के लिए जननी वाहन भी भेजे जा सकते हैं। इसके अलावा आरकेएस की एक इमरजेंसी गाड़ी भी उपलब्ध रहती है।
हालांकि जब उनसे पूछा गया कि रात के समय इन वाहनों की अनुमति देने और संचालन की जिम्मेदारी किसकी होती है तथा आपात स्थिति में किससे संपर्क किया जाए, तो उन्होंने कहा कि इसकी अथॉरिटी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) के पास है।
सीएमएचओ से संपर्क नहीं हो सका..
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. राकेश आठ्या को मामले में जानकारी लेने के लिए दो बार फोन किया गया, लेकिन बातचीत नहीं हो सकी। वहीं रात के समय कलेक्टर प्रताप नारायण यादव को भी फोन लगाया गया, लेकिन कॉल रिसीव नहीं हुई।
आपातकाल में किससे करें संपर्क?
इस पूरे मामले ने सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि यदि रात के समय किसी मरीज की हालत गंभीर हो जाए तो उसके परिजन आखिर मदद के लिए किससे संपर्क करें? जब जिम्मेदार अधिकारियों के फोन रिसीव नहीं होते और एम्बुलेंस समय पर उपलब्ध नहीं होती, तब मरीजों को निजी संसाधनों पर निर्भर होना पड़ता है।
निजी एम्बुलेंस का आर्थिक बोझ..
स्थानीय लोगों का कहना है कि मजबूरी में निजी एम्बुलेंस का सहारा लेना पड़ता है, जिसके लिए 3,500 से 4,000 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं। गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह अतिरिक्त बोझ बन जाता है।
एसडीएम ने दिए जांच के संकेत
मामले पर दमोह एसडीएम सौरभ गंधर्व ने कहा कि मामला उनके संज्ञान में आया है। अस्पताल प्रबंधन से जानकारी लेकर पूरे प्रकरण की जांच कराई जाएगी और आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।
व्यवस्था पर बड़ा सवाल..
प्रदेश सरकार द्वारा मरीजों को निःशुल्क और समय पर एम्बुलेंस सुविधा उपलब्ध कराने के लिए विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन दमोह जिला अस्पताल में इन योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पा रहा है। गर्भवती महिला को समय पर एम्बुलेंस न मिलना न केवल प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। यदि समय रहते व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो भविष्य में ऐसी लापरवाही किसी बड़े हादसे का कारण बन सकती है।



More Stories
जनसमस्याओं के निराकरण को लेकर राज्यमंत्री लोधी ने अधिकारियों को दिए निर्देश..
हिण्डोरिया पुलिस की बड़ी कार्रवाई, कार से 25 पेटी अवैध शराब जब्त..हिण्डोरिया पुलिस की बड़ी सफलता, पुणे से दस्तयाब हुई नाबालिग..
दमोह में गैस एजेंसियों पर प्रशासन की बड़ी कार्रवाईएक साथ 20 एजेंसियों की जांच में खुलीं अनियमितताएं, 2138 सिलेंडरों का मिला अंतर..